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माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली मेघा और भावना बोलीं- ऐसा भी वक्त आया, जब मौत सामने थी

आज इंटरनेशनल माउंटेन डे है। हम आपको दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मीटर) पर चढ़ाई की कहानी बता रहे हैं। ये कहानी वो दो लड़कियां बता रही हैं, जो 2019 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर चुकी हैं। पहली हैं मध्य प्रदेश के सिहोर के गांव भोजनगर की मेघा परमार। वो अपने राज्य से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली पहली महिला हैं। दूसरी हैं मध्य प्रदेश के ही छिंदवाड़ा की भावना डेहरिया। माउंट एवरेस्ट की कहानी, उसके शिखर पर चढ़ने वालों की जुबानी...

मेघा और भावना कहती हैं- हम जब हाई एल्टीट्यूड पर पहुंचते हैं तो वहां ऑक्सीजन बहुत कम होती है। हम बेस कैंप पहुंचते हैं, जो 5645 मीटर की ऊंचाई पर होता है। वहां दिल बहुत तेजी से धड़कने लगता है। इस तरह से जैसे कि कई बार 10 मंजिला इमारत की सीढ़ियां चढ़ ली हों, धड़कनें तब कुछ वैसी हो होती हैं। यह पूरी यात्रा दो महीने की होती है। इसमें चार कैंप होते हैं। हर कैंप में चुनौतियां बढ़ती चली जाती हैं।

हमारे जूते दो-दो किलो के होते हैं, जिनमें नीचे क्रैम्पॉन (मेटल की प्लेट, जिसके होने पर पैर फिसलते नहीं) लगे होते हैं। हम क्लाइंबिंग हमेशा रात के समय करते हैं, क्योंकि दिन के समय हिमस्खलन की आशंका होती है, जबकि रात में बर्फ जमी हुई होती है। सबसे कठिन कुंभ ग्लेशियर को पार करना होता है।

ऐसा नहीं होता कि आप एक ही बार में दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच जाओगे। आप पहले जाते हो, फिर वापस आते हो। फिर जाते हो, फिर वापस आते हो। ऐसा लगातार चलता रहता है। बेस कैंप से हम लोग कैंप-1 जाते हैं। फिर वहां से वापस बेस कैंप आते हैं। वहां पैर बहुत थकता है।

पीने के लिए हमेशा पानी नहीं मिल पाता। हर समय अंदर से शरीर टूटता है। सांस नहीं ली जाती। सीढ़ियां पार करते समय, जब वो हिलती हैं तो पैर कांपते हैं। उस समय हिम्मत बढ़ानी होती है कि रुको मत, ये भी हो जाएगा।

एवरेस्ट अभियान के दौरान पर्वतारोहियों को इस तरह की अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हुए शिखर पर पहुंचना होता है।

कैंप-1 पर पहुंचने के बाद वहां बर्फ खोदकर उसे पिघलाते हैं। वही पानी पीते हैं। सूप पीते हैं। पहली बार में बहुत तेज सिर दर्द होता है। कई लोगों को खून की उल्टियां होती हैं। दिमाग के पास ऑक्सीजन नहीं पहुंचती तो विचार आना भी बंद हो जाते हैं। नींद नहीं आती। एक घंटा भी नहीं सो पाते। वहां रात का टेम्प्रेचर माइनस 15 डिग्री तक हो जाता है, लेकिन हम उसको सेफ जोन बोलते हैं, क्योंकि वहां ग्लेशियर पिघलना शुरू नहीं होते।

बेस कैंप तक हम कुकिंग कर सकते हैं। दाल-चावल बना सकते हैं। नॉनवेज खा सकते हैं। इसके ऊपर ये सब बंद हो जाता है। जब हाई एल्टीट्यूड पर होते हैं तो ऐसा फूड खाना होता है, जो कुछ ही सेकंड में पक जाए। इसे खाना भी कुछ ही सेकंड में पड़ता है, क्योंकि कुछ मिनट में ही यह जम जाता है।

दो से तीन दिन के आराम के बाद कैंप-2 के लिए यात्रा शुरू होती है। कैंप-2 की चुनौतियां और ज्यादा हैं। वहां बहुत तेज रफ्तार से हवा चलती है। हम लोग जब गए थे, तब 80 किमी/घंटा की रफ्तार से हवाएं चल रही थीं। हमारे टेंट उड़ रहे थे। रात में हम चार लोग टेंट को पकड़कर बैठे थे कि कहीं वो उड़ न जाए। कई बार गला सूख जाता है। वहां रात काटना बहुत मुश्किल होता है। अगला पड़ाव कैंप-3 होता है।

यहां ऊंचाई बढ़ने के चलते चैलेंज और भी ज्यादा बढ़ जाता है। चेहरे की स्किन निकलने लगती है। कई जगह खून ऊपर आ जाता है। इसके बाद शुरू होती है कैंप-4 यानी डेथ जोन की यात्रा। कैंप-3 के बाद से ही सप्लीमेंट ऑक्सीजन देना शुरू कर दी जाती है, क्योंकि उसके बाद बिल्कुल भी सांस नहीं ली जाती। सबसे ज्यादा मौतें कैंप-4 में ही होती हैं। कोई ऑक्सीजन खत्म होने के चलते तो कोई फिसलकर जान गंवा देता है।

एवरेस्ट अभियान के लिए कम से कम एक साल पहले से ट्रेनिंग शुरू करनी होती है।

वहां 180 किमी प्रतिघंटा की स्पीड से हवा चलती है। आखिरी चढ़ाई के पहले वेदर रिपोर्ट देखते हैं। महीने में तीन या चार दिन ऐसे होते हैं, जिनमें से किसी एक दिन आप चढ़ाई कर सकते हो। कैंप-4 में मौत होना आम बात है। वहां इतनी मौतें हुई हैं, लाशें बर्फ में ढंकी हुई हैं। कई बार लाशों के ऊपर से चलते हुए हमें आगे बढ़ना होता है।

कंटीन्यू मूवमेंट करना पड़ता है, क्योंकि न चलने पर खून जम सकता है। जिससे आपकी मौत हो सकती है। कदमों का तालमेल सही रखना होता है। इन सबके बीच चुनौती ऑक्सीजन को बनाए रखने की होती है। कई लोग सिर्फ इसलिए मर जाते हैं, क्योंकि उनकी ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है।

कैंप-4 से गुजरने के दौरान हम लोगों को कई बार लाशों के ऊपर से निकलना पड़ा। कुछ मौके ऐसे भी आए, जब लाशों के सहारे ही आगे बढ़ पाए। आखिरी पड़ाव तक तो शरीर पूरी तरह से टूट गया था। ऐसा लग रहा था जैसे जान ही नहीं बची। बार-बार मन में आ रहा था कि रहने दो, छोड़ दो।

तब आपके दूसरे दिमाग को यह सोचना पड़ता है कि नहीं, करना ही है। इन सब चैलेंज के बीच फाइनली 22 मई को हम एवरेस्ट पर थे। मेघा सुबह 5 बजे एवरेस्ट पर पहुंची थीं, और उसके कुछ ही घंटों बाद भावना भी शिखर पर पहुंच चुकी थीं।


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