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पुराने वायरस ने बच्चों को ज्यादा प्रभावित नहीं किया था, पर नया स्ट्रेन उन्हें भी संक्रमित कर रहा है

कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन ने दुनियाभर को अचानक से एक बार फिर डरा दिया है। इस स्ट्रेन में एक बात यह देखी गई है कि ये बच्चों को भी संक्रमित कर रहा है। कोरोना के पुराने वायरस ने बच्चों को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया था। हालांकि, नए वायरस में भी मॉर्टेलिटी रेट यानी मृत्युदर ज्यादा नहीं है। यह स्ट्रेन बस अधिक संक्रामक होने के कारण बीमार कर रहा है। इसलिए बहुत अधिक चिंता की बात नहीं है।

यह वायरस अभी देश में नहीं है, लेकिन हमें सावधानी जरूर बनाए रखना है। हमारे यहां भी जिनोम सिक्वेंसिंग करके इस पर कई अध्ययन किए गए हैं। अलग-अलग राज्यों में काफी सैंपल हुए हैं, लेकिन ऐसा खतरनाक स्ट्रेन अब तक नहीं पाया गया है। कुछ एक सुपर स्प्रेडर जैसे वायरस स्ट्रेन मिले थे, लेकिन वो भी समय के साथ धीमे पड़ गए।

हमारे यहां रिकवरी रेट काफी ज्यादा है, कंफर्म केस भी ज्यादा रहे हैं इसलिए हर्ड इम्यूनिटी की भी उम्मीद हमारे यहां ज्यादा है। ऐसे में नए स्ट्रेन से भारतीयों को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। कोरोनावायरस का स्ट्रेन शुरुआत से ही म्यूटेट हो रहा है। शुरुआत में जो वायरस चीन में फैला, फिर यूरोप पहुंचा। इसके बाद भारत आया, ये सभी स्ट्रेन अलग-अलग हैं। यह लड़ाई मानव शरीर और वायरस के बीच है। मानव का शरीर अलग-अलग मात्रा में एंटीबॉडी बना रहा है, इसलिए वायरस भी तेजी से खुद को बचाने के लिए म्यूटेट कर रहा है। ऐसा पहले की महामारियों में भी हुआ है। वायरस खुद को बचाने के लिए बदलता रहता है। हालांकि, अब तक यह समय के साथ-साथ कमजोर पड़ते रहे हैं। अभी भी कुछ कहा नहीं जा सकता है। संभव है कि भविष्य में भी हमें कोरोना वायरस का म्यूटेशन देखने को मिले।

यहां बस चिंता की बात यह है कि इसके लिए बनाई गई वैक्सीन भी क्या नए वायरस पर असर करेगी। हालांकि, अब तक जानकारों ने और कंपनियों ने यही कहा है कि यह वैक्सीन नए स्ट्रेन पर भी काम करेगी। वैक्सीन के असर न करने की बात तब ही संभव है, जब वायरस बहुत ज्यादा ही बदल जाए। दूसरा अब हम वैक्सीन के बहुत करीब पहुंच गए हैं। लेकिन, हमें यह सोचना है कि क्या देश में यूनिवर्सल वैक्सीनेशन यानी सभी को टीके की जरूरत पड़ेगी? इसका भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहां ये उम्मीद है कि कई शहरों में हर्ड इम्यूनिटी आ चुकी हो। इसलिए हमें सोचना चाहिए कि कितने लोगों को यह टीका लगाना है। क्योंकि हमारे यहां फ्रंट लाइनर्स, बुजुर्ग और दूसरी बीमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या भी बहुत अधिक है। इन्हें चुनना, टीका लगाना और पूरी सप्लाई चेन बनाना देश के लिए एक बड़ी चुनौती है।

अच्छी बात यह है कि हमारे यहां पिछले 50 सालों में टीकाकरण पर काफी काम हुआ है, इसलिए हम इसे कर सकते हैं। हमारे यहां के प्राइमरी हेल्थ सेंटर, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर और डिस्ट्रिक्ट हेल्थ सेंटर आदि की क्षमता अच्छी है। हमारे यहां दक्षिण भारत के राज्य, नॉर्थ-ईस्ट के राज्य, छत्तीसगढ़, हिमाचल, महाराष्ट्र आदि में कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर और प्राइमरी हेल्थ सेंटर काफी मजबूत हैं। इन जगहों पर टीकाकरण अभियान में कोई दिक्कत नहीं है। हां, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसमें थोड़ा समय लग सकता है, क्योंकि इन राज्यों में लोकल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर अभी इतने मजबूत नहीं हैं। फिर भी हम देश के कोने-कोने में टीका पहुंचाने में सक्षम हैं।

हालांकि, इससे पहले यह साइंटिफिक इंक्वायरी जरूरी है कि कितने लोगों को वास्तव में अब टीके की जरूरत है। वहीं अब देश में केस भी लगातार कम हो रहे हैं। आज हमारे यहां रोजाना कन्फर्म्ड केस 24 हजार से 25 हजार के करीब आ रहे हैं। रोजाना होने वाली मौतें भी 350 के करीब हैं। यानी नंबर लगातार घट रहे हैं। कुछ लोग यह भी डरते हैं कि कहीं टेस्टिंग तो कम नहीं कर दी गई है, लेकिन ऐसा नहीं है। हमारे यहां पिछले साढ़े तीन माह में औसतन रोजाना 11 लाख के करीब टेस्ट हुए हैं, क्योंकि हमारा लॉन्ग टाइम एवरेज बेहतर है इसलिए यह सुकून देता है।

राज्यों की बात करें तो केरल में रोजाना अभी सबसे ज्यादा नंबर निकल रहे हैं। यहां चुनौती बड़ी है। महाराष्ट्र के कुछ जिले भी चिंता जगाते हैं। पंजाब में मौतों का आंकड़ा नहीं सुधर रहा है। यहां कई महीनों से आंकड़े चिंतित करने वाले रहे हैं, बल्कि मौतों का आंकड़ा पंजाब में और बढ़ा ही है। इसलिए हमें यह तो मानना चाहिए कि कोरोना का संक्रमण देश में कम हुआ है, लेकिन सतर्कता बिल्कुल नहीं छोड़नी चाहिए, क्योंकि यह एक संक्रामक रोग है और इसमें मरीजों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ जाती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य


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