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मोदी की लद्दाख यात्रा और ‘विस्तारवाद’ का जिक्र साफ संकेत देता है कि भारत शांति और विकास चाहता है लेकिन वह धमकियों के आगे झुकेगा नहीं

चीन द्वारा सैन्य दबाव बनाकर भारत को धमकाने के हालिया प्रयास से भारत-चीन के संबंध बदल गए हैं। ये वे संबंध हैं, जिन्हें 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के बाद से दशकों से भारतीय सरकारें संभालने का प्रयास करती रही हैं। तभी से चीन अपने क्षेत्रीय दावों को बढ़ाकर भारत का संतुलन बिगाड़े रखने का प्रयास कर रहा है और फिर भी दोनों देशों ने अपने मतभेदों को छुपाए रखने का प्रयास किया है। हालांकि पिछले पांच वर्षों में इस तरह के मतभेद हुए हैं, जिनसे भारत को चीन से निपटना पड़ा है।

एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चीन का हालिया सैन्य दाव उसकी पुरानी घुसपैठों से बहुत अलग रहा है। सेना को कई बिंदुओं पर बड़ी संख्या में इस तरह इकट्‌ठा करना इससे पहले 1962 में ही देखा गया था। रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी सीमा पर भी सेना भेज सकता है। चीन को मई से पहले की अपनी स्थिति में पहुंचाने के लिए हुई वार्ता के दौरान भी चीन, सीमा पर सैनिक, भारी हथियार, वाहन और एयरक्राफ्ट बढ़ाता रहा। भारतीय सेना ने भी ऐसा ही किया।

गलवान घाटी की घटना के बाद, जहां भारतीय सैनिक पहले से हुए समझौते के साथ पहुंचे थे, फिर भी भारतीय आर्मी कर्नल समेत 20 भारतीय सैनिकों की चीनी सैनिकों द्वारा हत्या कर देना दिखाता है कि सीमा पर सैनिकों में बहुत ज्यादा आक्रमकता है। हाल ही में आई रिपोर्ट्स भी चीन की आक्रमकता बढ़ने का खुलासा करती हैं। एक अखबार को दिए अपने बयान में चीन के विदेश मंत्री ने कहा कि चीन-भूटान सीमा पर कभी सीमांकन नहीं किया गया और ‘पूर्वी, केंद्रीय और पश्चिमी हिस्सों पर लंबे समय से विवाद रहा है।’

भारत की ओर बहुत बारीकी से इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि ‘किसी तीसरे पक्ष को उंगलियां नहीं उठानी चाहिए।’ चीन ने यह दावा बातचीत में पिछले 36 वर्षों से नहीं किया। इससे पहले रिपोर्ट्स ने यह इशारा किया कि चीन 8 मई से भूटान और तिब्बत से लगी सीमा पर ड्रोवा गांव के सामने सैन्य प्रशिक्षण बेस बना रहा है या अपग्रेड कर रहा है। ल्हासा के गोंग्गा एयपोर्ट से निर्माणस्थल तक फाइटर जेट्स और मिलिट्री बसों को भेजा गया।

मौजूदा परिस्थिति के पीछे कई कारक हैं। शी जिनपिंग के आगमन के साथ ही भारत और चीन के बीच रणनीतिक जगह के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई थी। शी ने नवंबर 2012 में 18वीं पार्टी कांग्रेस में इशारा किया था कि उनका मुख्य उद्देश्य ‘चीनी सपने’ को हासिल करना होगा, जिसमें ‘महान चीन राष्ट्र का पुनर्जीवन’ या दूसरे शब्दों में 2021 तक चीन द्वारा ‘उन क्षेत्रों को फिर पाना, जो विरोधी साम्राज्यवादी विदेशी ताकतों द्वारा अनुचित समझौतों से खो गए थे।’ इन क्षेत्रों में अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और लद्दाख भी शामिल हैं। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 2021 में 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर अतिरिक्त घरेलू दबाव भी है। शी ने अप्रैल 2015 में ‘चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर’ के साथ क्षेत्र में भू-रणनीतिक ‘वन बेल्ट, वन रोड’ का संचालन कर तनाव बढ़ा दिया था। फिर चीन ने हर संभव मौके पर जोर दिया कि भारत को ‘तनाव कम करने, कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए पाकिस्तान से वार्ता फिर शुरू करनी चाहिए और फिर चीन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करनी चाहिए!’

भारत पर बीजिंग का यह दबाव विस्तृत लद्दाख क्षेत्र, जिसमें अक्साई चीन, गिलगिट, बाल्टिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर शामिल हैं, में अपनी बड़ी रणनीतिक और वित्तीय दावेदारी को सुरक्षित रखने के लिए है। अनुच्छेद 370 के हटने से चीन का डर बढ़ा है और वह अब तक चार मौकों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मुद्दा उठा चुका है। क्षेत्र में चीन का बहुत कुछ दाव पर लगा है, इससे बीजिंग द्वारा सैन्य विकल्प का सहारा लेने की आशंका बनी हुई है।

हालांकि, जापान और भारत में मजबूत, राष्ट्रवादी नेताओं के उभरने से भूराजनैतिक परिदृश्य बदला है। दोनों नेताओं का अपने देश के लिए स्पष्ट विज़न है और उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे चीन के प्रभुत्व को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, जो कि चीन को बढ़ने से रोकने के लिए अमेरिका की दोनों पार्टियों द्वारा समर्थित प्रयास है, चीन की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है, खासतौर पर टेक्नोलॉजी सेक्टर को, जिससे बीजिंग का वैश्विक महाशक्ति बनने का सपना कमजोर पड़ रहा है।

यह सब दुनिया में कोविड-19 के कारण चीन विरोधी भावनाओं के बढ़ने के साथ ही हो रहा है। इससे चीन का शीर्ष नेतृत्व गंभीर चिंता में है।तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लद्दाख यात्रा और ‘विस्तारवाद’ का जिक्र स्पष्ट इशारा करता है कि भारत शांति और विकास तो चाहता है लेकिन वह धमकियों के आगे झुकेगा नहीं। इस बात को चीन के विरुद्ध कठोर आर्थिक उपायों से बल भी मिला है। शी जिनपिंग को मौजूदा संकट का हल तलाशना होगा जो कि पहले ही भारत-चीन संबंध को गहरा नुकसान पहुंचा चुका है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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जयदेव रानाडे, सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस एंड स्ट्रैटजी के प्रेसिडेंट और भारत सरकार के पूर्व इंटेलिजेंस ऑफिसर


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